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Jab Koi Tareef Kare Toh Kaunsi Dua Padhein | अपनी तारीफ़ सुनने पर क्या कहें?

December 23, 2025

اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي خَيْرًا مِمَّا يَظُنُّونَ، وَاغْفِرْ لِي مَا لَا يَعْلَمُونَ، وَلَا تُؤَاخِذْنِي بِمَا يَقُولُونَ

हिंदी तर्जुमा

अल्लाहुम्म-जअ़ल्नी ख़ैराम-मिम्मा यज़ुन्नून, वफ़्फ़िर-ली मा ला यअ़लमून, वला तुआख़िज़्नी बिमा यक़ूलून।

ENGLISH TRANSLATION

Allahumm-jalni khairam-mimma yazunnun, waffir-li ma la yalamun, wala tuakhizni bima yaqulun.

मआख़िज़ (SOURCE)

अल-अदब अल-मुफ़्रद

जब कोई हमारी अच्छी बातों या काम की तारीफ़ करता है, तो दिल को सुकून मिलना एक स्वाभाविक (natural) बात है। इस्लाम हमें भावनाओं को दबाने के लिए नहीं कहता, बल्कि उन्हें सही दिशा देने का तरीक़ा सिखाता है।

अक्सर जब कोई हमारी बड़ाई करता है, तो हमारे अंदर ‘अना’ या घमंड आने का ख़तरा रहता है। ऐसे मौक़ों पर अल्लाह के नेक बंदे और सहाबा-ए-किराम एक खास दुआ पढ़ा करते थे, ताकि उनका दिल ज़मीन से जुड़ा रहे और वे अल्लाह की रहमत को न भूलें।


तारीफ़ और इंसानी जज़्बा

तारीफ़ सुनना किसे अच्छा नहीं लगता? लेकिन एक मुसलमान के लिए तारीफ़ केवल खुश होने का नाम नहीं, बल्कि अपनी ज़िम्मेदारी को महसूस करने का वक़्त है। जब लोग आपकी अच्छाई बयान करते हैं, तो वे असल में अल्लाह की दी हुई उन नेमतों को देख रहे होते हैं जो उसने आपको अता की हैं।

इस्लाम का नज़रिया बहुत साफ़ है: हमें अपनी तारीफ़ सुनकर हवा में नहीं उड़ना चाहिए और न ही सामने वाले को बुरा-भला कहना चाहिए। इसके बजाय, हमें उस तारीफ़ को अल्लाह की तरफ़ मोड़ देना चाहिए। Jab koi tareef kare toh kaunsi dua padhein, यह सवाल हमें सिखाता है कि हम अपनी असलियत को पहचानें और अल्लाह से अपने गुनाहों की माफ़ी मांगें।


Jab Koi Tareef Kare Toh Kaunsi Dua Padhein

सहाबा-ए-किराम के दौर में जब कोई किसी की मुँह पर तारीफ़ करता, तो वे इस मसनून दुआ का सहारा लेते थे। यह दुआ दिल को साफ़ रखने का सबसे बेहतरीन ज़रिया है।

Arabic Dua

اللَّهُمَّ اجْعَلْنِي خَيْرًا مِمَّا يَظُنُّونَ، وَاغْفِرْ لِي مَا لَا يَعْلَمُونَ، وَلَا تُؤَاخِذْنِي بِمَا يَقُولُونَ

तलफ़्फ़ुज़ (Talaffuz)

अल्लाहुम्म-जअ़ल्नी ख़ैराम-मिम्मा यज़ुन्नून, वफ़्फ़िर-ली मा ला यअ़लमून, वला तुआख़िज़्नी बिमा यक़ूलून।

Roman (Hinglish)

Allahumma-j’alni khayram mimma yazunnoon, waghfir-li ma la ya’lamoon, wala tu’akhizni bima yaqooloon.

तर्जुमा (Tarjuma)

“ऐ अल्लाह! मुझे उससे बेहतर बना दे जो यह लोग मेरे बारे में गुमान करते हैं, और मेरे उन गुनाहों को माफ़ कर दे जिन्हें यह लोग नहीं जानते, और जो कुछ यह (मेरी तारीफ़ में) कह रहे हैं उस पर मेरी पकड़ न फ़रमा।”

Masdar (Source)

यह दुआ हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ (R.A) के अमल से साबित है। इमाम बुख़ारी ने इसे अपनी मशहूर किताब ‘अल-अदब अल-मुफ़्रद’ (Al-Adab Al-Mufrad) में ज़िक्र किया है।

याद रखें: इस दुआ को पढ़ते हुए दिल में यह एहसास होना चाहिए कि लोग सिर्फ़ हमारी खूबियाँ देख रहे हैं, जबकि हमारे ऐब अल्लाह ने छुपा रखे हैं।


क्या सिर्फ़ “शुक्रिया” कहना काफ़ी है?

आज के दौर में जब कोई हमारी तारीफ़ करता है, तो हम ‘थैंक यू’ या ‘शुक्रिया’ कहकर बात ख़त्म कर देते हैं। अदब के लिहाज़ से यह ग़लत नहीं है, क्योंकि किसी के अच्छे बोल का जवाब मुस्कुराकर देना भी एक अच्छी सिफ़त है।

लेकिन अगर हम सुन्नत के तरीक़े को अपनाना चाहते हैं, तो दुआ पढ़ना ज़्यादा अफ़ज़ल है। आप शुक्रिया कहने के साथ-साथ “जज़ाकल्लाहु ख़ैरा” भी कह सकते हैं। इससे सामने वाले को भी दुआ मिल जाती है और आपका दिल भी विनम्रता (humility) की तरफ़ झुक जाता है। सुन्नत पर अमल करने से न सिर्फ़ काम आसान होता है बल्कि उसमें अल्लाह की बरकत भी शामिल हो जाती है।


तारीफ़ के वक़्त दिल का रुख़

तारीफ़ के वक़्त अपने दिल की हालत पर नज़र रखना बहुत ज़रूरी है। जब कोई आपकी तारीफ़ करे, तो इन चंद बातों का ध्यान रखें:

  • अल्लाह का शुक्र: यह सोचें कि जो भी खूबी मुझमें है, वह अल्लाह की अता की हुई है। इसमें मेरा अपना कोई कमाल नहीं।
  • विनम्रता (Humility): अपनी कमियों को याद करें। जब हम अपनी ग़लतियों को याद रखते हैं, तो दूसरों की तारीफ़ हमें गुमराह नहीं कर पाती।
  • दिखावे से बचाव: कोशिश करें कि तारीफ़ सुनकर आपके अंदर ‘रिया’ यानी दिखावे का जज़्बा पैदा न हो।

मुख़्तसर सवाल-जवाब

1. क्या अपनी तारीफ़ सुनकर ख़ुश होना गुनाह है?
नहीं, तारीफ़ सुनकर ख़ुशी महसूस होना एक फ़ितरी बात है। लेकिन उस ख़ुशी को घमंड में बदलना या अपने आप को दूसरों से बड़ा समझना मना है।

2. क्या यह दुआ ज़ोर से पढ़नी चाहिए या दिल में?
आप इसे दिल में भी पढ़ सकते हैं और हल्की आवाज़ में भी। मक़सद अल्लाह से दुआ करना और अपने नफ़्स की इस्लाह (सुधार) करना है।


आख़िरी बात

इस्लाम हमें हर हाल में एतदाल (balance) सिखाता है। Jab koi tareef kare toh kaunsi dua padhein, यह जानना हमें समाजी अदब भी सिखाता है और रूहानी तौर पर मज़बूत भी बनाता है। सुन्नत की सादगी में ही हमारे लिए सुकून है। जब हम अल्लाह की तरफ़ रुजू करते हैं, तो वह हमारी खूबियों में और ज़्यादा निखार पैदा फ़रमाता है और हमें उन बुराइयों से बचाता है जो इंसान को समाज में ज़लील कर सकती हैं।

अल्लाह हम सबको विनम्रता और सही समझ अता फ़रमाए।

jab koi tareef kare toh kaunsi dua

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